कहीं अखिलेश को वाक ओवर देने का ठोस तरीका तो नहीं है निरहुआ को आजमगढ़ संसदीय क्षेत्र से उतारना।
ऐसा नहीं कि यह पहली बार हुआ है 2009 में कन्नौज सीट अखिलेश के द्वारा खाली करने के उपरांत डिंपल निर्विरोध चुनी गई थी।
बसपा ने उपचुनाव में अपना प्रत्याशी खड़ा नहीं किया ऐसा प्रचलन में है।
कांग्रेस ने भी डिंपल के खिलाफ अपना कैंडिडेट नहीं उतारा।
भारतीय जनता पार्टी ने जगदेव सिंह यादव नामक प्रत्याशी की घोषणा अंतिम समय में किया जो नामांकन की समय सीमा बीतने के बाद मजिस्ट्रेट के पास पहुंचे थे। जाहिर सी बात है की एक सोची-समझी रणनीति डिंपल को निर्विरोध जिताने के लिए तैयार की गई थी।
देश में निर्विरोध चुने जाने वाले सांसदों में डिंपल 44 में नंबर पर हैं।
उस समय के तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष राजनाथ सिंह का चौंकाने वाला बयान कि नामांकन करने के लिए जा रहे हमारे कैंडिडेट की बस लेट हो गई थी।
अब आप स्वयं विचार करिए छोटे-मोटे दल अथवा निर्दल कैंडिडेट भी नामांकन के समय दो चार गाड़ियां लेकर के जाता है अपने प्रस्तावक और समर्थकों के साथ, किंतु जनता को उल्लू बनाने वाला यह बयान सिद्ध करता है कि हम एक ही चट्टे बट्टे हैं।
आजमगढ़ संसदीय क्षेत्र से अखिलेश और निरहुआ की लड़ाई मे परिणाम क्या आएगा यह तो समय ही बताएगा किंतु अखिलेश की जोड़ का पहलवान भारतीय जनता पार्टी के पास नहीं है, अथवा अखिलेश के प्रति अतिशय प्रेम में निरहुआ को डमी के रूप में देखना प्रासंगिक होगा।
अखिलेश की जोड़़ कैसे हो सकता है निरहुआ? एक विवेचन। braj bhushan iitk | |
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